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समलैंगिक संबंध अपराध नहीं

देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. इसके अनुसार आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अब अपराध नहीं माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविल्कर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मसले पर सुनवाई की. संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि LGBT समुदाय को भी अन्‍य नागरिकों की तरह जीने का हक है. पीठ ने अपने आदेश में कहा, हमें पुरानी धारणाओं को बदलने की जरूरत है. नैतिकता की आड़ में किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता. यह निर्णय अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) की व्याख्या पर आधारित है, अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव की निषेध), अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार और गोपनीयता का अधिकार) के तहत दिया गया हैं. धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी. 24 साल और कई अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अंतिम फ़ैसला दिया है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि जो भी जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए. फ़ैसले का स्वागत करते हुए आईआईटी मुंबई के याचिकाकर्ता कृष्णा ने कहा, "आईआईटी में दाखिला मिलने पर भी इतनी खुशी नहीं हुई थी, जितनी आज हो रही है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध माना गया था. आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक, जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सज़ा या आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया था. इसमें जुर्माने का भी प्रावधान था और इसे ग़ैर ज़मानती अपराध की श्रेणी में रखा गया था.

राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय विधेयक 2018 पारित

लोकसभा ने 3 अगस्त 2018 को राष्‍ट्रीय खेल विश्‍वविद्यालय विधेयक 2018 पारित कर दिया है. राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय विधेयक पर सदन में चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित किया गया.इस विधेयक में खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से अपनी तरह का पहला राष्‍ट्रीय खेल विश्‍वविद्यालय मणिपुर में खोले जाने का प्रस्‍ताव है.राष्‍ट्रीय खेल विश्‍वविद्यालय का मुख्यालय मणिपुर में होगा.




बांध सुरक्षा विधेयक-2018 को मंजूरी

यह विधेयक राज्‍यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को एकरूप बांध सुरक्षा प्रक्रियाओं को अपनाने में मदद देगा, जिससे बांधों की सुरक्षा सुनिश्‍चित होगी और इन बांधों से होने वाले लाभ सुरक्षित रहेंगे.

पोक्सो एक्ट में बदलाव

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 21 अप्रैल 2018 को एक बड़े फैसले के तहत पोक्सो एक्ट में बदलाव के लिए अध्यादेश को मंजूरी दे दी. इस बैठक में 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस' यानी पॉक्सो एक्ट में संशोधन को हरी झंडी दी गई. इस संशोधन के तहत देश में 12 साल या उससे कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप के दोषियों को फांसी की सजा दी जा सकेगी. पॉक्सो कानून के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार इस जघन्य अपराध के लिए अधिकतम सजा उम्रकैद है, न्यूनतम सजा सात साल की जेल है. इसमें बलात्कार के बाद महिला की मृत्यु हो जाने या उसके मृतप्राय होने के मामले में एक अध्यादेश के माध्यम से मौत की सजा का प्रावधान शामिल किया गया जो बाद में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम बन गया.



निजता का अधिकार मौलिक अधिकार घोषित

24 अगस्त, 2017 को उच्चतम न्यायालय ने देश के प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार (Right to Privacy) को भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया। मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मत से अपने निर्णय, में कहा कि ‘‘निजता का अधिकार’’ भारतीय संविधान के भाग तीन का स्वाभाविक अंग है जो कि अनुच्छेद 21(जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत आता है। यह निर्णय विभिन्न जन-कल्याण कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा आधार कार्ड को अनिवार्य करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा हुआ है।

सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा)

सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) 1958 में संसद द्वारा पारित किया गया था और तब से यह कानून के रूप में काम कर रही है. आरंभ में मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, असम में भी इसे लागू किया गया था लेकिन मणिपुर सरकार ने वर्ष 2004 में राज्य के कई हिस्सों से इसे हटा दिया गया. जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) 1990 में लागू किया गया था. इस कानून के तहत सेना को किसी भी व्यक्ति को बिना कोई वारंट के तलाशी या गिरफ्तार करने का विशेषाधिकार है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) के तहत सेना के जवानों को कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर फायरिंग का भी पूरा अधिकार प्राप्त है.




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